नवरात्रों में की जाती है दुर्गा माता की पूजा, जानें नौ रूपों का महत्व

नवरात्र का पर्व साल में 4 बार आता है, जिसमें शारदीय और चैत्र नवरात्र का काफी अधिक महत्व बताया गया है। चैत्र नवरात्र का पर्व गर्मियों के आगमन के साथ किया जाता है और शारदीय नवरात्र, सर्दियों के आगमन का प्रतीक है। नवरात्र के दौरान माता दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। तो इसी क्रम में आइए जानते हैं कि नवरात्र के 9 स्वरूपों का क्या महत्व है।

दुर्गा माता के नौ स्वरूपों का महत्व

माता शैलपुत्री
शैलपुत्री माता पार्वती का ना है। ‘शैल’ शब्द का अर्थ होता है पर्वत। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देवी पार्वती का जन्म पर्वतराज हिमालय के घर हुआ था। इसीलिए उन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। यानी वे पर्वतराज की पुत्री हैं।

ब्रह्मचारिणी
ब्रह्मचारिणी नाम का शाब्दिक अर्थ है ‘तपस्या करने वाली।’ देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। उन्होंने कई वर्षों तक बिना खाए-पीए, जमीन पर बैठकर तप किया था। इस कठिन तपस्या के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी के नाम से जाना गया।

चंद्रघंटा
देवी के माथे पर एक अर्धचंद्र (आधा चाँद) बना हुआ है। इसी विशेष चिन्ह के कारण उन्हें चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है। ‘चंद्र’ का अर्थ होता है चाँद और ‘घंटा’ का अर्थ होता है घंटी जैसा आकार।

कूष्मांडा
देवी कूष्मांडा के भीतर ब्रह्मांड की सृष्टि करने की अद्भुत शक्ति निहित है। मान्यता है कि वे अपने उदर (पेट) में ही संपूर्ण ब्रह्मांड को धारण करती हैं। जैसे एक अंडे में एक नए जीवन की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार देवी कूष्मांडा ने अपने अंदर से ही संपूर्ण ब्रह्मांड को उत्पन्न किया। इसीलिए उन्हें कूष्मांडा के नाम से जाना जाता है।

स्कंदमाता
देवी पार्वती को स्कंदमाता के नाम से भी जाना जाता है। कार्तिकेय देव को स्कंद के नाम से भी पुकारा जाता है। चूंकि देवी पार्वती कार्तिकेय की माता हैं, इसलिए उन्हें स्कंदमाता भी कहा जाता है।

कात्यायिनी
जब असुर राज महिषासुर ने तीनों लोकों में अपना आतंक फैला दिया था, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने मिलकर एक शक्तिशाली देवी का निर्माण किया। इस देवी को महिषासुर का वध करने के लिए उत्पन्न किया गया था। महर्षि कात्यायन ने सबसे पहले इस देवी की पूजा की थी। इसीलिए माता को कात्यायनी के नाम से जाना जाता है।

कालरात्रि
मां भगवती के सात स्वरूपों में से एक है कालरात्रि। ‘काल’ शब्द का अर्थ है समय या संकट। माता कालरात्रि अंधकार के समान काले रंग की होती हैं और उनका स्वरूप भयानक दिखता है। लेकिन उनकी भयानकता के पीछे अपार शक्ति और दया छिपी होती है। वे सभी प्रकार के संकटों का नाश करने वाली हैं। माता कालरात्रि की पूजा करने से सभी प्रकार के भय और बुरी शक्तियों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है। हालांकि उनका स्वरूप भयानक है, लेकिन वे अपने भक्तों पर हमेशा कृपा बरसाती हैं।

महागौरी
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, तो उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उनका रंग काला हो गया। जब भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए तो उन्होंने देवी को गंगा जल से स्नान कराया। इस स्नान से देवी का शरीर चमकदार सफेद हो गया, मानो विद्युत की चमक सी हो। इसीलिए देवी का यह रूप महागौरी के नाम से जाना गया।

सिद्धिरात्री
सिद्धिरात्री को माता दुर्गा का नौवां स्वरूप माना गया है। सिद्धिरात्री माता को सिद्धियां प्राप्त करने वाली देवी कहा गया है। जो भी जातक माता सिद्धिरात्री की पूजा करते हैं उनके समस्त काम सिद्ध हो जाते हैं।

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