चंपत राय के बयान से बवाल! कहा- अयोध्या का मंदिर रामानंद संप्रदाय का; शैव, शाक्त और संन्यासियों का क्या काम?

अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन एवं प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में राजनीतिक ‘यजमान’ पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। कई प्रमुख लोगों ने तो ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ पर सियासी समीकरण और संघ-भाजपा सरकार के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है। कहा तो यह भी जा रहा है कि लोगों को आमंत्रित करने में लोकसभा चुनाव-2024 को ध्यान में रखा जा रहा है। इन परिस्थितियों में पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती और उत्तर पीठ (ज्योतिष) के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने भी नाराजगी जताते हुए राम मंदिर उद्घाटन एवं प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में जाने से इनकार कर दिया है। जिससे 22 जनवरी को होने वाले रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा उत्सव में शामिल होने पर संत समाज में भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गयी है।

एक खबर के मुताबिक अब देश के चारों पीठ के शंकराचार्य- पूर्व (गोवर्धन पीठ) के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती, पश्चिम (शारदा पीठ) के शंकराचार्य सदानंद सरस्वती, उत्तर (ज्योतिष पीठ) के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और दक्षिण (श्रृंगेरी पीठ) के शंकराचार्य भारती तीर्थ के राम मंदिर उद्घाटन समारोह में शामिल नहीं होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिस राम मंदिर के लिए संत-समाज मत और संप्रदाय के भेद को मिटाकर ‘राम जन्मभूमि न्यास’ को अपना समर्थन दिया और बाद में ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ को अपना सहयोग दिया, वही ट्रस्ट अब संतों के बीच मत और संप्रदाय के नाम पर राजनीति करने लगा है।

ताजा विवाद चंपत राय के बयान से शुरू हुआ है। चंपत राय ने कहा कि “मंदिर रामानंद संप्रदाय का है…शैव..शाक्त और संन्यासियों का नहीं” यानि अब मंदिर सिर्फ एक संप्रदाय-रामानंद संप्रदाय का है। चंपत राय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक और ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ के महासचिव हैं। इस ट्रस्ट के देखरेख में ही अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो रहा है।

चंपत राय के इस बयान को शंकराचार्यों की नाराजगी से जोड़कर देखा जा रहा है। कम से कम दो शंकराचार्यों ने स्पष्ट रूप से उद्घाटन समारोह में शामिल होने से इनकार किया है। इस पर चंपत राय मंदिर को रामानंद संप्रदाय का बता रहे है। यानि शंकराचार्य तो शैव हैं, ऐसे में वो रामानंद संप्रदाय के मंदिर में आए या आएं क्या फर्क पड़ता है?

यह पहली बार नहीं है जब चंपत राय के बयान से विवाद शुरू हुआ है। पहले भी वह विवादित बयान देते रहे हैं।
पहला, विवाद भाजपा के वरिष्ठ नेताओं लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के नाम पर हुआ था जब चंपत राय ने कहा कि हम आडवाणी और जोशी को आमंत्रित करने जायेंगे, लेकिन आमंत्रण देने के साथ ही यह निवेदन भी करेंगे कि अपनी अवस्था को देखते हुए वे लोग कार्यक्रम में न आएं। तब संघ-भाजपा समेत दूसरे हलकों में भी चंपत राय के इस बयान की निंदा हुई थी। तब कहा गया कि मेजबान आमंत्रित करता है, आमंत्रण स्वीकार करना या अस्वीकार करना मेहमान का है।

राम मंदिर के उद्घाटन एवं प्राण-प्रतिष्ठा समारोह को लेकर दूसरा विवाद तब सामने आया जब गोवर्धन पीठ जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने यह कह कर मामला गर्मा दिया कि मैं कार्यक्रम में ताली बजाने नहीं जाऊंगा, क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा में…पीएम मोदी को आगे कर संत समाज को नजरंदाज किया जा रहा है। शंकराचार्य निश्चलानंद ने तो यहां तक कहा कि मेरी एक मर्यादा है, वहां जाकर मैं अपनी प्रतिष्ठा को कम नहीं करूंगा।

इसके बाद विवाद की तीसरी घटना भाजपा के फायरब्रांड नेता और राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के प्रमुख चेहरा रहे विनय कटियार के बयान से सामने आया। कटियार ने कहा कि राम मंदिर निर्माण के लिए किसी एक व्यक्ति को श्रेय नहीं दिया जा सकता। क्योंकि राम मंदिर के लिए लालकृष्ण आडवाणी और कार्यकर्ताओं ने बहुत बलिदान दिया है।

इसके साथ ही विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को आमंत्रित करने या न करने पर रोज ही विवाद और विरोध के स्वर उभर रहे हैं। ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट’ सीधे तौर पर केंद्र सरकार के इशारे पर काम कर रहा है।

संघ-भाजपा राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर हिंदू-मुसलमान के बीच नफरत के बीज बोए। लेकिन अब वह इसके माध्यम से हिंदुओं के बीच भी वैष्णव, शैव, शाक्त और रामानंदी के नाम पर बंटवारा करने में लगी है।

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