कॅरियर के मझधार में युवा आईएएस के नौकरियां छोड़ने के मायने

देश में मोदी राज की दूसरी पारी में एक के बाद एक आईएएस अधिकारियो द्वारा नौकरी से इस्तीफे की घटनाएं चौंकाने वाली इसलिए है कि अगर राष्ट्र आजादी  के बाद सर्वाधिक चमकीले दौर में प्रवेश कर गया है तो ये अफसर सरकारी ताम झाम और पावर को अलविदा क्यों कह रहे हैं? क्या उन्होंने नौकरी के अनुशासन और दा‍यित्वों को बंधन मान लिया है अथवा अभिव्यक्ति की आजादी का वायरस अब उस तंत्र में भी प्रवेश कर गया है, खुद जिस पर इस आवाज को नियंत्रित करने की प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष जिम्मेदारी रही है?  इसी के साथ यह सवाल भी तैर रहा है ‍कि क्या यह सरकार चलाने वालों का सरकार के प्रति विरोध जताने ट्रेंड है या फिर केवल बेहतर अवसरों  की तलाश में गुलामी का जुआ उतारने की चाहत है? क्या ये देश की सबसे शक्तिशाली लाॅबी में गहरे मोहभंग और असंतोष  की शुरूआत है 

कि अब लोक सेवा का कोई व्यावहारिक अर्थ नहीं रह गया है। बेहतर है कि वो अपना अलग आशियाना बनाकर मनमाफिक काम कर सकें। 
ये तमाम सवाल इसलिए मौजूं हैं, क्योंकि बीते दो माह में चार वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों ने अलग-अलग कारणों से इस रूतबे वाली नौकरी को अलविदा कह दिया है और कुछ और भी इसी राह पर चल सकते हैं। यूं कोई भी नौकरी करना या छोड़ना, सम्बन्धित व्यक्ति की इच्छा और आकांक्षा पर निर्भर करता है। इस अर्थ में आईएएस भी नौकरी छोड़कर दूसरी संभावनाएं तलाश रहे हैं तो इसमें गैर कुछ भी नहीं है। सरकार कोई सी भी हो, उन्हें उसके हिसाब से काम करना है, क्योंकि उनका मुख्य काम ही सरकार की नीतियों पर अमल करना और कराना है। उन्हें वह हर काम करना है जो संविधान के अनुरूप और लोकहित की दृष्टि से अपेक्षित है। इसी के लिए उन्हें असीमित अधिकार, काम करने के विविध और चुनौतीपूर्ण अवसर,  बेहतर वेतन, सुविधा और रूतबा‍ दिया जाता है। संवैधानिक रूप से ये  लोक सेवक होते हैं, लेकिन जनमानस में उनकी छवि ‘कलेक्टर’की होती है, जिसे लोगों पर राज करने के लिए तैनात किया हुआ होता है। दरअसल प्रशासन का लोक भाषा में अर्थ राज करना ही है, जो हमारी बरसों की गुलामी में पगे लोक मानस में आज भी कायम है।  

लेकिन यदि इस ‘राज’ करने वाली नौकरी से भी अफसरों का मोहभंग हो रहा है तो इसके पीछे कुछ कारण हैं। ऐसा नहीं है इससे पहले अफसरों ने आईएएस ( भारतीय प्रशासनिक सेवा) को अलविदा न कहा हो। कई अफसरों ने तरक्की के बेहतर अवसर नौकरशाही के बजाए राजनीति में देखे और नौकरी से इस्तीफा दे दिया। कुछ ने बेहतर वेतन तथा कारपोरेट की चुनौतियों में अपनी प्रगति देखी तो कई ने अपना व्यवसाय अथवा समाजसेवा में अपने जीवन की सार्थकता देखी। 
लेकिन इस बार जो इस्तीफे हो रहे हैं, वो मुख्‍यत: उस सरकार की नीतियों अथवा कार्य शैली के विरोध स्वरूप हो रहे हैं, जिसे देश की जनता ने बहुमत से चुना है।  वो सरकार, जिसके पास भारी जन समर्थन है। जो अपने एजेंडे, मान्यताअों और प्रतिबद्धताअों के साथ काम करना चाहती है और कर भी रही है। लगता है ऐसी सरकार के साथ कई आईएएस अफसरों को काम करने में दिक्कत हो रही है। अगर हाल के इस्तीफों पर गौर करें तो इसका नारियल सबसे पहले  वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग के इस्तीफे से फूटा। 1983 बैच के आईएएस गर्ग उन्हें अचानक केन्द्र में वित्त सचिव के पद से हटाए जाने पर नाराज थे। हालां‍कि उन्हें अगले साल ही रिटायर होना था। लेकिन जिन अफसरों के  कॅरियर के सुनहरे साल अभी आने थे, वो भी दनादन नौकरी से त्यागप‍त्र दे रहे हैं। इनमें पहला नाम कन्नन गोपीनाथन का है। कन्नन अरूणाचल, गोवा, मिजोरम व केन्द्र शासित प्रदेश केडर के युवा अधिकारी थे और केरल की बाढ़ में उन्होंने  अच्छा काम किया था। लेकिन नौकरी कन्नन ने केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में उठाए कदमों से व्यथित होकर छोड़ी। हालांकि कन्नन न तो कश्मीरी हैं और न ही कश्मीर कैडर के अधिकारी हैं, फिर भी उनका मानना है कि कश्मीर में धारा 370 हटाना अलोकतांत्रिक था और मोदी सरकार वहां कश्मीरियों का दमन कर रही है।  इसके दो दिन बाद ही कर्नाटक कैडर के शशिकांत सेंथिल ने भी आईएएस से इस्तीफा यह कहकर दिया कि मौजूदा दौर में जब हमारे विविधतापूर्ण लोकतंत्र की सभी संस्थाएं अभूतपूर्व तरीके से समझौता कर रही हैं, ऐसे में मेरा काम जारी रखना अनैतिक होगा। अपने लिखित बयान में सेंथिल ने यह भी कहा कि आने वाला वक्त हमारे देश के मूल स्वभाव के लिए और भी चु्नौती पूर्ण होगा। लिहाजा बेहतर होगा कि मैं आईएएस छोड़कर लोगों के जीवन की भलाई के लिए काम करूं। उसी दिन अरूणाचल,गोवा, मिजोरम कैडर के एक और  युवा अधिकारी कशिश मित्तल ने भी सेवा से त्यागपत्र दे दिया। मित्तल फिलहाल नीती अायोग में पदस्थ थे। इनमें से कन्नन और सेंथिल की गिनती सुयोग्य और दक्ष अधिकारियों में होती रही है। 
अब सवाल यह है कि आईएएस अफसर तेजी से नौकरी से त्यागपत्र क्यों दे रहे हैं? क्या लोक सेवा से उनका मोहभंग हो गया है या संविधान की भावना के अनुरूप और निष्ठापूर्वक काम करने की परिस्थितियां अब नहीं रहीं? क्या आईएएस अफसरों की हैसियत महज डाकखाने या हुक्मबरदार की रह गई है या फिर ये अफसर अपने अंतरात्मा की आवाज पर सरकारी रूतबे को तलाक दे रहे हैं? 

कहा जा सकता है कि जब देश में करीब साढ़े 5 हजार आईएएस अफसर हैं तो दो-चार चले भी गए तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ना है? यह तो गाड़ी का एक पुर्जा अलग होने के बराबर है। लेकिन ये इस्तीफे महत्वपूर्ण इसलिए भी हैं, क्योंकि देश में आईएएस अफसरों की पहले से कमी है। इसी साल केन्द्रीय कार्मिक मंत्री ने लोकसभा में बताया था कि देश में आईएएस के कुल 6609 पद हैं, जिनमे से 1500 खाली पड़े हैं। ऐसे में चार अफसरों का अचानक चले जाना भी मायने रखता है। तो फिर ये लोग नौकरी छोड़कर अपना भविष्य दांव पर क्यों लगा रहे हैं? क्या अफसरों पर मोदी सरकार की सख्‍ती से घबरा कर वो ये कदम उठा रहे हैं या फिर सरकार के स्तर पर संविधान की मनमानी व्याख्या और अपने लक्ष्यों को पाने के लिए कार्यपालिका से हर संभव कसरत की अपेक्षा का यह परिणाम है? खासकर तब ‍िक जब देश में बढ़ती बेरोजगारी का रोना हो, काम धंधे के अवसर घटने के अलार्म बज रहे हों तब कुछ लोग भरीपूरी नौकरियों को दांव पर लगाकर क्या सिद्ध करना चाहते हैं? क्या उन्हें पता नहीं था कि आईएएस की नौकरी में आने का अर्थ, मर्यादा और प्रतिबन्ध क्या हैं? इसके आचरण ‍िनयम क्या हैं? यदि पता था तो उन्होंने इतने साल नौकरी में क्यों गुजारे? खास बात यह है ‍कि नौकरी अमूमन वे अफसर ही छोड़ने पर बाध्य होते हैं जो व्यवस्था से समझौता नहीं करते या उस में रम नहीं पाते। भ्रष्ट, तिकड़मी और जी हजूर अफसरों के लिए तो यह तंत्र पहले ही नंदनवन था और रहेगा।
सबसे बड़ा प्रश्न है कि क्या कॅरियर के मझधार में इस तरह आईएएस छोड़ना किसी नए ट्रेंड का संकेत है या फिर इन लोगों पर जीवन में रिस्क लेने की खब्त सवार है? आईएएस का परित्याग अगर किसी नैतिक और संवैधानिक असहमति के अाधार पर किया जा रहा है तो सरकार तो इस पर गंभीरता से सोचना होगा। इस बात को समझना होगा कि असहमति को खारिज करने और अभिव्यक्ति को हर कीमत पर दबाने की प्रवृत्ति क्या रंग दिखा सकती है ? अगर काबिल अफसर ऐसे ही नौकरी छोड़ने को ‘मुक्ति  का मार्ग’ समझते रहे तो सरकार ‍किनके भरोसे सुराज की पालकी ढोएगी? लोक कल्याण का शामियाना किसके खम्भों पर तनेगा ? 

अजय बोकिल की कलम से
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