काॅमरेड पेरीन दाजी का 91 वर्ष की उम्र में निधन

इंदौर. काॅमरेड होमी दाजी की पत्नी पेरीन दाजी का 91 वर्ष की उम्र में बुधवार को निधन हो गया। वे लंबे समय से बीमार थीं। बीते तीन दिनों से अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। पारसी होते हुए भी पति की तरह ही मालवा मिल मुक्तिधाम पर उनका दाह संस्कार किया गया।

जितने जिद्दी होमी, सिस्टम के प्रति उतनी ही सख्त पेरीन: सीताराम येचुरी 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव सीताराम येचुरी ने पेरीन दाजी को याद करते हुए कहा-नि:शब्द हूं मैं… बड़े अफसोस की बात है कि वे नहीं रहीं। कुछ साल पहले ही मैं इंदौर आया था तो उनसे मुलाकात हुई थी। देश में जनता के लिए लड़ने वाले ऐसे लोग कम हैं। वे होमी दाजी को संबल देती थीं।

यही कारण था कि वे लड़ते रहे। उसी परंपरा को उन्होंने आगे रखा। दाजी जितने जिद्दी थे, पेरीनजी भी सिस्टम के प्रति उतनी ही सख्त थीं। हालांकि मजदूरों के प्रति उनका व्यवहार हमेशा मां की तरह ही रहा। जो भी मिलता, प्यार से पूछतीं लेकिन जो गलत बात पर आवाज नहीं उठाता उसे डांटती भी थीं। 


दाजी 1 मई 1946 को भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने थे। उन्हें श्रमिक वर्ग के आंदोलन का प्रभारी बनाया गया। तब इंदौर महत्वपूर्ण कपड़ा केंद्र था। दाजी पार्टी में शामिल हुए, ठीक उसी समय कपड़ा मिलों में 12 दिन की हड़ताल हुई थी। वरिष्ठ नेताओं की गिरफ्तारी हुई और दाजी को इस आंदोलन का चार्ज लेना पड़ा। होमी सशक्त वक्ता थे और कम समय में मिल श्रमिकों में बहुत लोकप्रिय हो गए। दाजी की तबीयत बिगड़ने लगी तो पेरीनजी ने ही संभाला। श्रमिक भाइयों के लिए लड़ने में दोनों में एक जैसी इच्छा शक्ति थी। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि। 

इससे बेहतर विदाई का हक था इंदौर की मां को

जीवन में सबकुछ अस्थायी है। एकमात्र स्थायी चीज है दूसरों के मन में छोड़ा गया आपका प्रभाव। सबसे अहम यह है कि जब आप दुनिया से चले भी जाओ, तब भी लोग तुम्हें एक नेक, ईमानदार और सिद्धांतवादी इनसान के तौर पर याद रखें। होमी से मैंने ये सीखा कि हम अपने आप को कामयाब मान सकते हैं जब हमारे आसपास के लोग हमें प्यार करें। हमसे प्रेरणा लें। होमी ने मुझे सिखाया कि जमाने के लिए जीना ही सच्चा जीना है। -कॉमरेड पेरीन दाजी

राजनेता न अस्पताल पहुंचे न अंतिम यात्रा में 

पेरीन

इंदौर के हक की कई लड़ाइयां लड़ने वालीं पेरीन को अंतिम विदाई देने न कोई विधायक आया, न मेयर, न ही कोई सरकारी नुमाइंदा। अस्पताल में भी उनका हाल जानने कोई नहीं गया। पेरीन परिजनों से अकसर कहती थीं कि मेरे मरने के बाद शरीर पर लाल झंडा ओढ़ाया जाए। जहां होमी दाजी का अंतिम संस्कार हुआ, वहीं मेरा भी हो। परिजनों ने इसे पेरीन की अंतिम इच्छा मानते हुए वैसा ही किया।

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