अभी भी नहीं बदले गरीब परिवार के हालात, बच्ची ने भूख और लाचारी की वजह से की थी मंदिर में चोरी

सागर जिले के रहली विधानसभा क्षेत्र में पिछले दिनों मंदिर से पैसे चुराने के बाद जेल जाने वाली नाबालिक पर मीडिया की नजरें पड़ने और उसकी लाचारी और भूख की वजह से चोरी की दास्तां मीडिया में प्रकाशित होने के बाद, प्रशासन ने आनन-फानन में उसे तमाम तरह की योजनाओं के लिए पात्र घोषित कर दिया। उसकी जमानत भी करा दी गई। मंत्रालय से मंत्री उसकी झोपड़ी में पहुंच गए, प्रदेश के मुखिया ने एक लाख रुपए सहायता देने का वादा किया, लेकिन अफसोस की तारीख और अखबार की सुर्खियां दोनों बदल गई, नहीं बदले तो उस नाबालिक मासूम के गरीब परिवार के हालात।
रहली कि इस गरीब परिवार का 2 महीने से ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी हाल पहले ही जैसा है, एसडीएम साहब ने गैस चूल्हा और सिलेंडर तो दिया पर कनेक्शन नहीं मिला, नगर पालिका ने राशन कार्ड में नाम तो जोड़ दिया पर राशन पर्ची और राशन अब तक नहीं मिल सका, पड़ोसी ने हालात पर तरस खाकर जमीन का टुकड़ा तो दे दिया पर कुटीर की राशि अब तक नहीं मिली, प्रदेश के मुखिया कमलनाथ ने एक लाख नगद सहायता का वादा तो किया पर सहायता राशि अब तक नहीं मिली। कुल मिलाकर वादे और दावे तो तमाम हुए, लेकिन जमीनी तौर पर किसी भी तरह का लाभ इस परिवार को नहीं मिला। आज भी परिवार किसी तरह चूल्हे पर दो वक्त की रोटी सेंक रहा है।
मासूम की लाचारी सुर्खियों में क्या तब्दील हुई, मानो सारे सिस्टम की संवेदना ही उसके प्रति अनुकूल हो गई और योजनाओं के लिए उसे पात्र मानकर मानो योजनाओं का लाभ दे ही दिया गया। लेकिन दो महीने बाद जब नेता प्रतिपक्ष के बेटे अभिषेक भार्गव वहां पहुंचे, तो उन्होंने फेसबुक पर नाबालिक के वर्तमान हालात पर प्रशासन और सरकार को आड़े हाथों लेते हुए तंज कसा। हालांकि उनके अनुसार वे वहां राजनीति करने नहीं बल्कि मासूम को उसके हक के लिए सहायता दिलवाने का प्रयास करने की कोशिश कर रहे हैं।
जहां एक ओर पीड़ित परिवार और बीजेपी नेता पीड़ित परिवार को अब तक सहायता से वंचित बता रहे हैं, वहीं प्रशासन अपनी मजबूरियां गिना रहा है। और जल्द लाभ दिलाने की बात कर रहा है। रहली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव लंबे समय से विधायक रहे हैं जबकि वर्तमान में सरकार कांग्रेस की है। इस मामले के सामने आने के बाद लगातार दोनों पक्ष एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति करते रहे हैं, लेकिन अफसोस राजनीतिक मैदान में एक पीड़ित परिवार फुटबॉल की तरह यहां से वहां भटकने को मजबूर हो गया है। सागर से सुधीर द्विवेदी की रिपोर्ट।

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