सियासत में किन्नरों ने खूब दिखाया है दम,शबनम मौसी से भवानी मां तक…

आम आदमी पार्टी ने भवानी मां को इलाहाबाद में बनाया कैंडिडेट
शहडोल की शबनम मौसी बनी थीं देश की पहली किन्नर विधायक
वर्ष 1994 में किन्नर समुदाय को मिला था मतदान का अधिकार
2001 के नगर निगम चुनाव में आशा देवी बनीं थीं गोरखपुर मेयर

इलाहाबाद लोकसभा सीट से आम आदमी पार्टी ने किन्नर अखाड़े की महामंडलेश्वर भवानी नाथ बाल्मीकि (भवानी मां) को प्रत्याशी घोषित किया है। आम आदमी पार्टी का कहना है कि यह किन्नरों को सामाजिक सम्मान दिलाने की एक और कोशिश की है। यह पहला मौका नहीं है जब किन्नर चुनाव मैदान में है। इससे पहले भी कई किन्नरों ने चुनावी मैदान में दम दिखाने की कोशिश की और कई ने जीत भी दर्ज की।
शबनम मौसी: पहली किन्नर विधायक

लोकसभा चुनाव से जुड़ी रोचक बातें

वर्ष 2000 में शबनम मौसी बनी थीं देश की पहली किन्नर विधायक


देश की पहली किन्नर विधायक मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए 2000 में चुनी गईं। मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के सोहागपुर निर्वाचन क्षेत्र से वर्ष 2000 के उपचुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शबनम मौसी ने शानदार जीत दर्ज कर देश की राजनीति के इतिहास में नया पन्ना जोड़ दिया। 14 से अधिक भारतीय भाषाओं की जानकार शबनम मौसी को उस समय 44.08 फीसदी वोट मिले थे। उन्होंने बीजेपी के प्रत्याशी को 17,863 वोटों से हराया था। 2002 के विधानसभा चुनाव में वह फिर चुनाव मैदान में उतरीं, लेकिन हार गईं।
गुलशन: एमएलए से मेयर तक चुनाव
2012 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी गुलशन अयोध्या में जीत नहीं पाईं, लेकिन 20 हजार से ज्यादा वोट हासिल कर बीजेपी प्रत्याशी लल्लू सिंह की हार का कारण बनीं। गुलशन नगर पालिका परिषद चेयरमैन का चुनाव लड़ीं और 200 वोटों से हारीं। 2017 में एसपी ने मेयर प्रत्याशी बनाया। इस चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी ऋषिकेश उपाध्याय सिर्फ 35 सौ वोटों से जीते। उपाध्याय को 44628 वोट मिले, जबकि किन्नर गुलशन को 41,035 वोट मिले।
पायल: लालजी टंडन को दी टक्कर
2002 के विधानसभा चुनाव की बात करें, तो उन चुनाव में एमपी की सीटों पर सौ से अधिक किन्नर प्रत्याशी मैदान में थे, जबकि यूपी से 18 किन्नरों ने अलग-अलग सीटों से नामांकन किया। इनमें पायल सहित तीन किन्नर लखनऊ की अलग-अलग विधानसभाओं से प्रत्याशी थे। किन्नर पायल लखनऊ पश्चिम की उस सीट से मैदान में थीं, जहां से बीजेपी के धुरंधर नेता लालजी टंडन जीतते रहे थे।
आशा देवी: गोरखपुर की मेयर रहीं
2001 के नगर निगम चुनाव में गोरखपुर की जनता ने इतिहास रचा। तमाम राजनैतिक पार्टियों और दिग्गजों को दर-किनार कर जनता ने किन्नर आशा देवी उर्फ अमरनाथ को जिताया। उस समय प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी और गोरखपुर से योगी आदित्यनाथ सांसद थे। चूड़ी चुनाव चिह्न पर आशा देवी ने एसपी प्रत्याशी अंजू चौधरी को 60 हजार वोटों से पराजित किया। चुनाव में आशा देवी को 1.08 लाख वोट, एसपी की अंजू चौधरी को 45 हजार और बीजेपी की विद्यावती देवी को 13 हजार वोट मिले थे। ‘किन्नरों का हो रहा सशक्तीकरण’
लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले समाजशास्त्री डॉ. शरद कुमार कहते हैं, ‘किन्नरों को वोट का अधिकार है। थर्ड जेंडर के रूप में समाज में मान्यता दी गई है। संत समाज ने भी उनके लिए अखाड़ा गठित किया है। उनका सशक्तीकरण हो रहा है। ऐसे में वह अगर राजनीति में आते हैं तो उसका स्वागत होना चाहिए।’

टिकट मिलने पर मां भवानी नाथ बाल्मीकि का कहना है, ‘हम संन्यासी हैं, हमारा भरण-पोषण जनता करती है। जनता के लिए हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है। इसी भावना को लेकर चुनाव लड़ने जा रही हूं, ताकि आम जनता की आवाज बन सकूं।’

लोकसभा चुनाव से जुड़ी रोचक बातें

कुंभ के दौरान भवानी को मिली थी महामंडलेश्वर की पदवी।


किन्नर गुलशन बिन्दु का कहना है, ‘गरीबी, बेरोजगारी और किसानों की हालत ने राजनीति में आने को विवश किया। हम भी समाज में अपना योगदान देना चाहते हैं। हमारे पीछे कोई परिवार नहीं, जो है वह सब समाज के लिए ही होगा।’

दिलचस्प तथ्य
1994 में किन्नरों को मतदान का अधिकार मिला
2017 में मिली थर्ड जेंडर की मान्यता
8374 यूपी में थर्ड जेंडर मतदाता
146 लखनऊ में थर्ड जेंडर मतदाता

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