1956 में नए मध्य प्रदेश के निर्माण के पहले विंध्य प्रदेश एक अलग राज्य था। आजादी के बाद कुछ देसी रियासतों को मिलाकर विंध्य प्रदेश का गठन किया गया था। राज पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों के बाद विंध्य प्रदेश 1956 से मध्य प्रदेश का हिस्सा हो गया, जो आज तक प्रदेश का अंग है। विंध्य राज्य में 1951-52 के पहले चुनाव में लोकसभा की चार सीटें थी, जिसमें विंध्य-शहडोल और छतरपुर -दतिया-टीकमगढ दो सीटें आरक्षित होने से दो उम्मीदवार अतिरिक्त मैदान में थे। इस तरह विंध्य से चयनित लोकसभा सदस्यों की संख्या छह थी।
प्रदेश में पहले चुनाव में चार सीटों के लिए 24 उम्मीदवारों ने अपना भाग्य आजमाया था। राष्ट्रीय दल के 20 और 4 निर्दलीय उम्मीदवार थे। विंध्य प्रदेश की सीटों पर कांग्रेस का बहुमत था, उन्हें चार स्थानों पर विजय हासिल हुई थी। शहडोल-सीधी क्षेत्र से कांग्रेस ने कोई उम्मीदवार चुनाव मैदान में नहीं खड़ा किया था। इस क्षेत्र से सोशलिस्ट पार्टी के भगवान दत्त शास्त्री और किसान मजदूर प्रजा पार्टी के रंदामन सिंह विजयी हुए थे।
रीवा से कांग्रेस के राजभान सिंह, सतना से कांग्रेस के एस. डी. उपाध्याय और छतरपुर -दतिया-टीकमगढ आरक्षित सीट से कांग्रेस के मोतीलाल मालवीय और रामशाही तिवारी विजयी रहे थे। चुनाव मैदान में 24 उमीदवारों में से नौ अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे।
भारतीय जनसंघ ने मत तो अधिक प्राप्त किए परंतु उसे सफलता नहीं मिल पाई थी। जनसंघ के दो उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई थी। जनसंघ ने कुल मतदान का 12.71 प्रतिशत मत प्राप्त किए थे।
कांग्रेस के चारों प्रत्याशी विजयी रहे
कांग्रेस ने चार उम्मीदवार खड़े किए थे और चारों विजयी रहे थे। राज्य में कांग्रेस को कुल मतदान के 33.75 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। दूसरे नंबर पर सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाली पार्टी सोशलिस्ट पार्टी थी जिसे 17.78 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। आल इंडिया शेड्यूल कॉस्ट फेडरेशन के हरदास छतरपुर-दतिया -टीकमगढ से चुनाव मैदान में थे उन्हें 24,859 मत प्राप्त हुए थे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। विंध्य प्रदेश में चुनाव मैदान में सर्वाधिक 10 उम्मीदवार छतरपुर -दतिया-टीकमगढ से खड़े हुए थे। अन्य क्षेत्रों में चार या पांच उम्मीदवार मैदान में थे।









