ग्वालियर-चंबल में BJP ने हासिल की बंपर सीटें, सिंधिया का जादू फिर से चल गया

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में भाजपा की बंपर जीत ने प्रदेश में इतिहास रच दिया है. चुनाव परिणामों से पहले तक के अनुमानों में ग्वालियर-चंबल इलाके में बीजेपी की स्थिति बेहद कमजोर बताई जा रही थी, हालांकि रिजल्ट ने इन तमाम अटकलों पर विराम लगा दिया है. ग्वालियर चंबल इलाके की 34 में से 18 सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की है, वहीं कांग्रेस 16 सीटों पर सिमटकर रह गई है. ग्वालियर-चंबल में भाजपा की सफलता के बाद सिंधिया फैक्टर की चर्चाएं हो रही हैं.

ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में आठ जिले हैं- इनमें से पांच -ग्वालियर, शिवपुरी, दतिया, अशोकनगर और गुना – ग्वालियर संभाग में हैं, और तीन – मुरैना, भिंड और श्योपुर- चंबर संभाग में हैं. ये सभी क्षेत्र ग्वालियर रियासत का हिस्सा थे और सिंधिया परिवार यहां राज करता था.

चंबल का 2018 बनाम 2023 चुनाव परिणाम
2018 के विधानसभा चुनावों में, चंबल की 13 सीटों में से कांग्रेस ने 10 सीटों पर जीत हासिल की थी. वहीं भाजपा कुल 2 सीट ही जीत पाई थी. वहीं एक सीट पर बसपा ने जीत हासिल की थी. 2023 के विधानससभा चुनावों में, भाजपा ने चंबल की 6 सीटों पर कब्जा कर लिया है, वहीं कांग्रेस इस बार 7 सीटों पर सिमट कर रह गई है.

ग्वालियर का 2018 बनाम 2023 चुनाव परिणाम
ग्वालियर संभाग में कुल 21 सीटें हैं, 2018 में कांग्रेस ने इनमें से 16 सीटों पर जीत हासिल की थी और भाजपा मात्र 5 सीटों पर सिमटकर रह गई थी. वहीं इस बार भाजपा ने ग्वालियर संभाग की 12 सीटों पर कब्जा कर लिया है, वहीं कांग्रेस 9 सीटों पर सिमट कर रह गई है.

BJP में सिंधिया फैक्टर कितना प्रभावी रहा?
2018 के विधानसभा चुनावों में ग्वालियर-चंबल इलाके में कांग्रेस को मिली बंपर जीत का श्रेय ज्योतिरादित्य सिंधिया को दिया गया था. कांग्रेस की सत्ता में वापसी का श्रेय भी ग्वालियर-चंबल में मिली जीत को दिया गया था. 2018 में जहां भाजपा ने इस इलाके में बेहद कमजोर प्रदर्शन किया था, वहीं सिंधिया के भाजपा ने में शामिल होने के बाद पार्टी ने कांग्रेस को बुरी तरह पटखनी दी है और 34 में से 18 सीटों पर कब्जा कर लिया है.

कांग्रेस छोड़ भाजपा में हुए शामिल
केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया 2020 में कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे. 2018 के विधानसभा चुनावों में कमलनाथ के अलावा सिंधिया भी कांग्रेस के सीएम फेस के तौर पर भी प्रोजेक्ट किए गए थे. हालांकि कमलनाथ को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली. कमलनाथ से विवादों के बाद सिंधिया ने कांग्रेस का दामन छोड़ दिया था और वे भाजपा में शामिल हुए थे. 2020 में बीजेपी सिंधिया और उनके समर्थकों के सहयोग से ही सत्ता में आई थी और कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई थी.

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