नाबालिग होने के दावों का निर्धारण करते समय स्कूल प्रमाण पत्र के अनुसार जन्म रिकॉर्ड को गांव के रिकॉर्ड पर प्राथमिकता : जेएंडके एंड एल हाईकोर्ट

जम्मू एंड कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने गुरुवार को दोहराया कि नाबालिग होने के दावों का पता लगाने के लिए, अदालतों को प्ले स्कूल के अलावा अन्य शैक्षणिक संस्थान द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिसमें सबसे पहले आरोपी ने दाखिला लिया था। जस्टिस एम ए चौधरी की पीठ ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ दायर रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें मजिस्ट्रेट के फैसले को बरकरार रखा गया था कि याचिकाकर्ता/अपीलकर्ता किशोर नहीं था।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि दोनों निचली अदालतों ने गांव के चौकीदार के रिकॉर्ड के आधार पर एक आरोपी के रूप में याचिकाकर्ता की किशोरावस्था का फैसला किया था और याचिकाकर्ता/आरोपी के पक्ष में जारी किए गए स्कूल प्रमाण पत्र पर भरोसा नहीं किया था, जिसे अन्य रिकॉर्ड पर प्रधानता प्राप्त है। इस मामले पर फैसला सुनाते हुए, जस्टिस चौधरी ने कहा कि इस विषय पर कानून कहता है कि किशोर होने के दावे का पता लगाने के लिए प्ले स्कूल के अलावा अन्य शैक्षणिक संस्थान द्वारा जारी किए गए प्रमाण पत्र को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसमें सबसे पहले आरोपी ने अपनी पढ़ाई शुरू की थी।

कानून की उक्त स्थिति को पुष्ट करने के लिए बेंच ने विजय सिंह बनाम दिल्ली राज्य 2012 के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले पर दृढ़ भरोसा जताया, जिसमें यह माना गया था कि किशोर होने के दावे में मैट्रिक या समकक्ष प्रमाण पत्र को पहली प्राथमिकता दी जाती है, दूसरी प्राथमिकता उस स्कूल से जारी जन्म प्रमाण पत्र (प्ले स्कूल के अलावा) को दी जाती है,जिसमें सबसे पहले पढ़ाई शुरू की गई थी और अन्य प्रमाण पत्र के अभाव में, नगर पालिका या पंचायत द्वारा जारी प्रमाण पत्र को स्वीकार किया जाता है।

मामले में प्रचलित कानून को लागू करते हुए, पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में आरोपी ने उसकी जन्म तिथि 20.08.1996 दिखाई थी, जैसा कि गवर्नमेंट (बॉयज) हाई स्कूल बारी ब्राह्मण जम्मू में दर्ज है, जहां उसने सबसे पहले दाखिला लिया था और इसलिए उक्त स्कूल द्वारा जारी जन्म तिथि पर भरोसा किया जाना चाहिए था और याचिकाकर्ता / आरोपी की जन्म तिथि 20.08.1996 के रूप में स्वीकार की जानी चाहिए थी। कोर्ट ने आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि इस प्रस्ताव को ध्यान में रखते हुए, दोनों निचली अदालतों ने स्कूल रिकॉर्ड में दर्शाई गई जन्मतिथि को स्वीकार नहीं करके गलती की, जो जांच के दौरान भी साबित हुई थी। पीठ ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता की उम्र स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर 20.08.1996 के रूप में स्वीकार की जानी चाहिए, जिसे (जैसे गांव के चौकीदार के रिकॉर्ड की तुलना में) अन्य दस्तावेजों पर प्रधानता प्राप्त है। अदालत ने कहा,”इसलिए, याचिकाकर्ता/अभियुक्त अपराध की तिथि के समय 18 वर्ष से कम आयु का था और किशोर न्याय अधिनियम की परिभाषा के तहत एक किशोर था। इसलिए उसका मुकदमा, किसी भी मामले में, नियमित सत्र न्यायालय द्वारा नहीं केवल किशोर न्याय बोर्ड द्वारा संचालित किया जा सकता है।” पूर्वगामी कारणों से अदालत ने याचिका को अनुमति दे दी और याचिकाकर्ता के खिलाफ मामले को आगे की कार्यवाही के लिए किशोर न्याय बोर्ड जम्मू में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।

केस टाइटल- संजय रैना बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य व अन्य साइटेशन- 2022 लाइव लॉ (जेकेएल) 218

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