बेटों को बेदखल करने के आदेश में दखल देने से दिल्‍ली हाईकोर्ट का इनकार

नई दिल्ली :उच्च न्यायालय ने कहा कि इस चरण में संबंधित संपत्ति में पक्षों की प्रकृति या अधिकार अथवा पक्षों के हित पर गौर करना वरिष्ठ नागरिक कानून के उद्देश्यों के प्रतिकूल होगा।

मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश के खिलाफ बुजुर्ग व्यक्ति के दोनों बेटों द्वारा दायर एक अपील को खारिज कर दिया। एकल न्यायाधीश ने संभागीय आयुक्त द्वारा पारित आदेश को बरकरार रखा था, जिन्होंने बेटों को उनके पिता के घर से बेदखल करने का आदेश दिया था।

खंडपीठ ने कहा, ‘प्रतिवादी संख्या दो (पिता) के शांतिपूर्ण अस्तित्व के लिए, यह अदालत एकल न्यायाधीश के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने के लिए इच्छुक नहीं है जिन्हें (पिता) अपने जीवन का डर सता रहा है। यहां अपीलकर्ताओं (दोनों बेटों) के लिए यह आवश्यक है, जो संबंधित संपत्ति पर परिसर को खाली करने के लिए प्रतिवादी संख्या दो के अधिकार से श्रेष्ठ कोई अधिकार सिद्ध नहीं कर पाए हैं

खंडपीठ ने कहा, ‘एकल न्यायाधीश द्वारा निकाले गए निष्कर्ष वरिष्ठ नागरिक कानून के अनुरूप हैं, जिसे वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए लाया गया है।’ खंडपीठ ने कहा कि इस समय, वह इस सवाल पर विचार नहीं कर रही है कि क्या वरिष्ठ नागरिक कानून संपत्ति के मालिकाना हक के संबंध में एक डिक्री या दीवानी अदालत के निष्कर्ष को दरकिनार करने का प्रावधान करता है। वरिष्ठ नागरिक ने हलफनामे में कहा है कि वह यहां बलजीत नगर में मकान के मालिक हैं और उनका सबसे छोटा बेटा उनकी देखभाल करता है, लेकिन उनके अन्य दो बेटे उनका सहयोग नहीं करते हैं और उनके तथा परिवार के साथ दुर्व्यवहार और मारपीट करते हैं।

वरिष्ठ नागरिक ने कहा है कि वह मकान बेचना चाह रहे उन दो बेटों को बेदखल करना चाहते थे। उन्होंने 2018 में एक सार्वजनिक नोटिस जारी करके दोनों बेटों से नाता खत्म करने की घोषणा की थी। वरिष्ठ नागरिक का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ता अरुण पंवार ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के दोनों बेटों ने पिता के लिए उनके मकान में शांति से रहना बेहद मुश्किल बना दिया है।

दोनों बेटों में से एक ने कहा कि उसने संपत्ति के एक हिस्से पर अपना घर अपने खर्च पर और अपने पिता की सहमति से बनाया है इसलिए उसे बेदखल न किया जाए, वहीं दूसरे बेटे ने कहा कि संपत्ति में हिस्सेदारी के संबंध में उसका अपने पिता के साथ समझौता हो गया। हालांकि, शिकायतकर्ता ने इस समझौते से इनकार किया और कहा कि इस दस्तावेज पर उसके हस्ताक्षर धोखे से कराए गए थे और वह इन दोनों बेटों को अपनी संपत्ति नहीं देना चाहते।

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