उपचुनाव: कमलनाथ, ‘महाराज और शिवराज ठोकेंगे ताल, आज की स्थिति में भाजपा को 18 सीटें

मध्यप्रदेश में कोरोना के साथ ही सियासी चालों ने भी कदमताल शुरू कर दिया है। सब कुछ ठीक रहा तो जुलाई 2020 तक संभावित मध्यप्रदेश में होने वाले 24 विधानासभा के उप चुनाव राज्य के कद्दावर तीन नेताओं के पराजय को जीत में बदलने के लिए महाभारत जैसी परिस्थितियों का निर्माण कर रहा हैं ऐसा माना जाये तो हर्ज नहीं है। ये तीन नेता हैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिनकी चौथी बार बनने वाली सरकार के सपने को ग्वालियर-चंबल संभाग के मतदाताओं ने कांग्रेस को जिताकर चकनाचूर कर दिया था, इन्हें अपने उस पराजय का बदला लेना है और ग्वालियर-चंबल संभाग की 16 विधान सभा क्षेत्रों में भाजपा का परचम लहराना है। दूसरे हैं ग्वालियर के ‘महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया, इन्हें लोकसभा चुनाव में अपने ही एक सहयोगी के सामने घुटने टेकने पड़े और वे गुना लोकसभा चुनाव हार गये। मतलब सिंधिया दूसरे बड़े नेता है जिन्हें पराजय का बदला विधानसभा के उप चुनावों में लेना है। और तीसरे नेता है मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ जो जीतकर भी हार गये। कमलनाथ को सत्ता डुबोकर जो पराजय मिली है उसका हिसाब चुकाने के लिए उन्होंने अब प्रशांत किशोर फार्मूला फिर से लागू करने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और ज्योतिरादित्य सिंधिया की कैमिस्ट्री का ग्वालियर-चंबल के अलावा मालवा में भी व्यापक असर है। हमारी टीम ने उन सभी 24 विधान सभा क्षेत्रों का सतही सर्वें में पाया है कि आज की स्थिति में भाजपा की झोली में 18 विधान सभा क्षेत्रों में भाजपा की शिवराज-महाराज की जोड़ी जीत हासिल करने के लिए सक्षम है। जबकि कमलनाथ के पास सुनिश्चित कोई भी सीट जीत के लिए उपलब्ध नहीं है परन्तु एंटी इनकंबेन्सी फेक्टर कोरोना के कारण केन्द्र सरकार और राज्य सरकार दोनों के खिलाफ जो 3 महीने में उभर कर सामने आया है उसका फायदा कमलनाथ को मिल सकता है। सूत्रों के अनुसार शिवराज-महाराज का वार रूम यदि ग्वालियर होना तो कमलनाथ ने भी फैसला किया है कि कांग्रेस का भी वार रूम ग्वालियर बनाया जायेगा। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के हाथ में ‘वार रूम की चाबी होगी और कमलनाथ मैदान में ताल ठोकेंगे। सवाल इस क्षेत्र में बसपा की दखलअंदाजी का नुकसान किसे होगा इस सवाल का फिलहाल उत्तर है बसपा के उम्मीदवार भले ही ग्वालियर-चंबल की सभी सीटों में प्रभाव डालेंगे, परन्तु नुकसान कांग्रेस को होगा। इस रिपोर्ट का लब्बो-लुआब यह है कि महाराज-शिवराज दोनो अपने-अपने पराजय का बदला लेने के लिए अपनी पूरी प्रतिष्ठा दांव पर लगायेंगे और जनता इस जोड़ी को पसंद भी करेगी। जबकि कमलनाथ का संघर्ष पराजय को जीत में बदलने का है वह इन 24 विधानसभा उप चुनावों से शुरू होकर 2023 के विधान सभा चुनाव तक जारी रहेगा, हालांकि अच्छी खबर यह हैं कमलनाथ के पक्ष में 6 सीटों का सकारात्मक रवैया है।

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