ईरान और अफगानिस्तान अमेरिका के खिलाफ जंग में चीन के बहुत काम आएंगे

बीजिंग; रूस और यूक्रेन युद्ध शुरू होने से सबसे बड़ी सीख चीन को मिली है। चीन को इस बात का अहसास हो गया था कि अगर वह ताइवान पर हमला करता है तो अमेरिका वही कदम उठाएगा जो उसने रूस के खिलाफ उठाए। यानी कि चीन पर प्रतिबंध और पश्चिमी देशों की ओर से बायकॉट। दो साल से ज्यादा समय से रूस और यूक्रेन का युद्ध चल रहा है। इस दौरान रूस ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का मजाक बना दिया है। इसकी सबसे बड़ी वजह रूस के पास खुद की ऊर्जा की मौजूदगी है। रूस ने कच्चा तेल भारत और चीन को बेचा और युद्ध लड़ता रहा। लेकिन चीन को पता है कि उसके पास ऊर्जा का विशाल भंडार नहीं है। चीन दुनिया के उन टॉप-10 देशों में है, जिसके पास पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा तेल है। लेकिन बड़ी आबादी के कारण वह तेल का निर्यात करता है। युद्ध के समय उसे निर्यात प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए उसने पहले ही तैयारी शुरू कर दी है।

चीन अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन ईरान के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान का कच्चा तेल दुनिया में सप्लाई नहीं होता। चीन को पता है कि यही कच्चा तेल युद्ध के दौरान उसकी मदद करेगा। वह कौड़ियों के भाव पर तेल खरीद सकेगा। इससे उसका खुद का तेल भंडार भी कम नहीं होगा। इसके अलावा चीन दो पड़ोसियों अफगानिस्तान और ताजिकिस्तान में अपनी गतिविधियों को बढ़ा रहा है। अफगानिस्तान में इस समय तालिबान का शासन है। पूरी दुनिया में अभी तक उसे मान्यता नहीं मिली है। लेकिन चीन में तालिबान का राजदूत मौजूद है। 2023 में कई चीनी कंपनियों ने तालिबान सरकार के साथ बिजनेस डील पर हस्ताक्षर किए हैं। वहीं चीन अफगानिस्तान में लिथियम भंडार की माइनिंग में लगा है। लेकिन अमेरिकी एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन की चाल कुछ और है।

चीन को क्यों है अफगानिस्तान की जरूरत?

यूट्यूब पर शॉन रयान शो में सीआईए की एजेंट सारा एडम्स ने इसे लेकर एक नई थ्योरी के बारे में बताया था। उन्होंने कहा, ‘हर किसी को लगता है कि वो (चीन) लिथियम के लिए अफगानिस्तान में है। लेकिन वहां एकदम दूसरी चीज है, जिससे चीन को मतलब है। चीन ने ईरानियों से एक डील की है कि अगर अमेरिका ने चीन पर हमला किया तो वह ईरान से तेल खरीदेगा। इस तेल को चीन तक पहुंचाने के लिए रास्ता अफगानिस्तान से गुजरेगा। क्योंकि यूएस सऊदी और दक्षिण अमेरिका से आने वाले तेल की सप्लाइ कट कर देगा।’

ताजिकिस्तान में बनाया मिलिट्री बेस

एक सवाल यह भी हो सकता है कि चीन आखिर पाकिस्तान से यह तेल क्यों नहीं लगाएगा? इसे लेकर माना जा रहा है कि युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान पर अमेरिका दबाव बना सकता है। लेकिन ईरान और तालिबान पर उसका जोर नहीं चलेगा। वहीं हाल ही में रिपोर्ट आई थी कि चीन ने ताजिकिस्तान में मिलिट्री बेस भी स्थापित किया है। सैटेलाइट तस्वीरों में यह खुलासा हुआ है। ताजिकिस्तान की सीमा चीन और अफगानिस्तान से लगती है। दुनिया में अपनी मिलिट्री उपस्थिति दर्ज कराने के लिए चीन को यह जरूरी है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन ने तालिबान के कारण क्षेत्र में बने वैक्यूम से निपटने के लिए यह बेस बनाया है। चीन ने सफाई देते हुए कहा कि उसने कोई भी बेस नहीं बनाया है।

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