बच्चे सुबह 7 बजे स्कूल जा सकते हैं, तो जज और वकील 9 बजे कोर्ट क्यों नहीं आ सकते?

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यू यू ललित ने सही सवाल उठाया है। वे शुक्रवार सुबह साढ़े नौ बजे कोर्ट आ धमके और एक सुनवाई के दौरान कहा कि जब हमारे बच्चे सुबह सात बजे स्कूल जा सकते हैं तो हम लोग नौ बजे कोर्ट क्यों नहीं आ सकते। संभावना है कि अगले महीने ही जस्टिस ललित सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी बन जाएंगे।

निश्चित ही समय की बात कहने के पीछे उनका इशारा कोर्ट की उन छुट्टियों की तरफ भी होगा जो कभी शीतकालीन तो कभी ग्रीष्मकालीन अवकाश के नाम पर ली जाती रही हैं। अब भी जारी हैं। निश्चित ही इशारा यह भी होगा कि देशभर की छोटी-बड़ी अदालतों में जब पौने पांच करोड़ केस लंबित हों तब जज और वकील इतनी सुस्ती से कैसे काम कर सकते हैं।

सुस्ती से मतलब अनेक छुट्टियां और साढ़े दस बजे से पहले सुनवाई शुरू नहीं होना और इसके अलावा किसी भी केस की अंतिम सुनवाई का कोई समय प्राय: तय नहीं होना।

आंकड़े बताते हैं अकेले सुप्रीम कोर्ट में 70 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग है। अटॉर्नी जनरल के मुताबिक देशभर के उच्च न्यायालयों में पेंडिंग मामलों की संख्या 42 लाख से भी ज्यादा है। छोटे-बड़े सभी कोर्ट में तो यह संख्या 4.70 करोड़ है। इनमें भी कम से कम 15% मामले ऐसे हैं जो 10 से 30 साल पुराने हैं। ऐसे में अगर जस्टिस ललित 9 बजे कोर्ट शुरू करने की बात कह रहे हैं तो इसमें गलत क्या है?

जहां तक तहसीलदार और SDM कोर्ट की बात है, जहां अति गरीब और किसानों के केस चल रहे हैं, उनकी तो कहीं गिनती तक नहीं है। जाने कितने सालों से कितने गरीबों की भावनाएं यहाँ फाइलों में दबी धूल फांक रही हैं।

पता ही होगा कि कलकत्ता हाईकोर्ट देश का पहला हाईकोर्ट है। इसकी स्थापना 1862 में हुई थी। लंबित मामलों के बारे में भी यह अव्वल है। यहां सबसे ज्यादा ढाई लाख केस लंबित हैं। हो सकता है कम लोगों को पता हो कि यहां का केस नं. AST/1/1800 देश का सबसे पुराना केस है। 221 साल हो गए, लेकिन इसका निबटारा नहीं हो सका।

सन् 1800 में यह केस एक निचली अदालत में दर्ज किया गया था। 170 साल तक यह केस निचली अदालतों में झूलता रहा। 1970 में यह केस कलकत्ता हाईकोर्ट में आया, ताकि ‘जल्द’ सुनवाई हो सके। 52 साल हो गए यहां भी वही हाल है। इस केस की हाईकोर्ट में आखिरी सुनवाई 20 नवंबर 2018 को हुई थी, पर अभी खत्म नहीं हुआ है। चल रहा है।

कितनी पीढ़ियां गुजर गईं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। एक रिपोर्ट के अनुसार जितने केस अभी अदालतों में लंबित हैं, उन्हें निपटाने की गति यही रही तो पौने पांच करोड़ केस निपटाने में कम से कम 325 साल लगेंगे।

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