शास्त्रों की बात , जानें धर्म के साथ जैसे कि जब जानते हैं कि श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को प्रत्येक वर्ष रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है इस बार 22 अगस्त दिन रविवार को मनाया जा रहा है। बताया जाता है कि राखी का त्यौहार न केवल कलयुग में बल्कि पौराणिक काल मे भी काफी प्रसिद्ध था। बल्कि इतना ही नहीं प्राचीन समय में रक्षाबंधन की राखी को अनेक प्रकार के विभिन्न नामों से जाना जाता था। तो चलिए जानते हैं कि राखी को पौराणिक काल में किन किन नामों से जाना जाता था।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्राचीन काल में सबसे पहले राखी को मणिबंध के नाम से जाना जाता था। उस समय में हाथों की कलाई को मणिबंध कहा जाता था। इसके अलावा लोकमत है कि वैदिक काल में यज्ञ व मांगलिक कार्यों के दौरान एक सूत का धागा बांधकर संकल्प मंत्र का उच्चारण किया जाता था जो आज के समय में भी प्रचलन में है। इसी सूत के धागे को मणिबंध कहते थे।
समय के साथ मौली मणिबंध का विकसित रूप बन गया। प्राचीन समय में मात्र सूत के तीन सफेद धागे ही हल्दी में रंग कर बांधे जाते थे। परंतु बाद में तीनों धागे अलग-अलग रंग के हो गए जिसमें लाल। पीला और हरा रंग शामिल है। कभी-कभी यह पांच रंगों में भी हो जाते थे इसमें नीला और सफेद रंग भी शामिल होता था। कहा जाता है कि 3 रंग त्रिदेव के और पांच रंग पंचदेव के प्रतीक होते हैं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार मौली को हाथ की कलाई, गले और कमर में बांधा जाता है। कलाई पर बांधी जाने के कारण इसे कलावा कहते हैं।
मणिबंध, मौली व कलावा सभी को संकल्प और रक्षा सूत्र के नाम से भी जाना जाता है। जब किसी मन्नत को पूरा करने के लिए से बांधा जाता है तो इसे मन्नत का धागा भी कहा जाता है।
उपरोक्त बताए गए रक्षा सूत्र के कारण ही रक्षाबंधन पर राखी का प्रचलन हुआ। कहा जाता है कि भाई-बहन के इस पवित्र त्यौहार को प्राचीन काल में अलग-अलग रूप से मनाया जाता था जिसमें पहले सूत का धागा होता था, फिर नाड़ा बांधने लगे, फिर नाड़ी जैसा एक फुंदा बांधने का प्रचलन आया और आखिर में पक्के धागे पर फोम से सुंदर फूलों को बनाकर चिपकाया गया, जो राखी कहलाने लगा। वर्तमान समय की बात करें तो राखी के कई रूप हो चुके हैं राखी कच्चे सूत जैसी सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे, रेशमी धागे तथा सोना चांदी जैसी महंगी वस्तु तक पहुंच गई है।









