अस्पताल और बीमा कंपनी के फेर में फंसे बीमाधारक

भोपाल।

स्वास्थ्य बीमा (हेल्थ इंश्योरेंस) के जरिए बीमाधारकों को कोरोना या अन्य कोई बीमारी होने पर अस्पताल के खर्चों से राहत मिल जाती है। यही कारण है कि राजधानी में बीते एक वर्ष में स्वास्थ्य बीमा लेने वालों की संख्या में 30 फीसद तक की बढ़ोतरी हुई है। लोगों ने तीन से 10 लाख रुपये तक की ऐसे पॉलिसियां ली हैं, जिनमें कोरोना जैसी गंभीर बीमारी भी कवर होती है, लेकिन इन दिनों बीमाधारक अस्पताल एवं कंपनी के नियमों के फेर में पिस रहे हैं। कई अस्पताल मरीजों को बिल देते वक्त उन्हें दिए गए पैकेज का विवरण नहीं देते हैं, बल्कि एकमुश्त राशि लिखते हैं। जब अस्पताल में हुए खर्च का क्लेम किया जाता है तो बीमा कंपनियां इसे खारिज कर देती हैं। बीमा कंपनियों का तर्क है कि जब तक अस्पताल में हुए खर्च का विस्तृत ब्यौरा नहीं होगा, तब तक क्लेम मंजूर नहीं किया जा सकता। राजधानी भोपाल में ऐसे कई केस आ रहे हैं। इससे बीमाधारकों के करोड़ों रुपये फंस गए हैं।

सरकार ने तय की राशि, इसलिए एकमुश्त लिख रहे

राजधानी के ज्यादातर अस्पतालों में कैशलेस इलाज नहीं किया जा रहा है। इस कारण बीमाधारक को अपने पास से बिल चुकाना पड़ता है। फिर वे कंपनी में क्लेम करते हैं, किंतु ब्यौरा न होने के कारण क्लेम मंजूर नहीं किया जाता। दरअसल, सरकार ने कम संक्रमित मरीजों के इलाज के लिए 10 दिन के 75 हजार रुपये निर्धारित कर रखे हैं। इसका फायदा अस्पताल उठा रहे हैं। वे प्रतिदिन का चार्ज साढ़े सात हजार रुपये वसूल रहे हैं, जबकि कई पॉलिसी में पलंग व डॉक्टर की फीस की राशि पांच हजार रुपये से कम होती है। इसलिए कंपनियां ब्यौरा मांग रही है। अस्पताल और कंपनी के इसी फेर में बीमाधारक उलझे हुए हैं।

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