अस्पतालों के बेड फुल, कब्रिस्तान-श्मशान में भी जगह नहीं

देश में कोरोना संक्रमण की स्थिति भयावह होती जा रही है। महाराष्ट्र, दिल्ली, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, गुजरात उन राज्यों में शामिल हैं जहां अस्पतालों में बिस्तर कम पड़ रहे हैं, कब्रिस्तान में जगह कम पड़ रही है और श्मशानों में अंतिम संस्कार के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। दिल्ली के सबसे बड़े कब्रिस्तान आईटीओ-स्थित जदीद क़बीरतन अहले इस्लाम में भी जगह कम पड़ गई है। छत्तीसगढ़ और झारखंड में शवदाह के लिए प्लेटफार्म बढ़ाने पड़ रहे हैं। गुजरात के सूरत में कब्रों की एडवांस में खुदाई कराई जा रही है। मध्य प्रदेश के इंदौर और भोपाल शहरों का भी हाल बेहाल हैं।

रांची में मरीजों को न तो अस्पतालों में बेड मिल पा रहे हैं और न ही समय पर सैंपलों की जांच हो पा रही है। अंतिम संस्कार के लिए भी लाइन लग रही है। एक साथ कतार में जलती लाशों का नजारा इससे पहले कभी नहीं देखा गया। सभी निजी अस्पतालों में मरीजों को नो बेड का हवाला देकर वापस किया जा रहा है। सरकारी अस्पतालों रिम्स और सदर अस्पताल में भी बेड खाली नहीं हैं। कई मरीजों की मौत अस्पताल की चौखट पर हो चुकी है। पिछले चार दिनों में राज्य में 150 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। रांची मंें मंगलवार को 52 शवों का अंतिम संस्कार किया गया, जबकि सोमवार को 22 और बुधवार शाम तक एक दर्जन से अधिक शवों की अंत्येष्टि हुई।

मध्य प्रदेश में लगातार बढ़ रही मृतकों की संख्या

मध्य प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों में श्मशानों में शवों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। बुधवार को इंदौर में 150 से ज्यादा शवों का दाह संस्कार किया गया, वहीं राजधानी भोपाल में 88 संक्रमितों का अंतिम संस्कार किया गया। जबलपुर के चौहानी मुक्तिधाम में बुधवार रात तक 50 शवों का अंतिम संस्कार किया गया। ग्वालियर में यह संख्या सात रही। इंदौर के पंचकुइया श्मशान घाट के सेवादार गोपाल बोरोनिया ने बताया कि अधिक शव आने के कारण प्लेटफार्म से अलग खुले परिसर में चिता बनाकर शवों का अंतिम संस्कार किया जा रहा है। यही स्थिति भोपाल के श्मशानों में भी है।

अपनों का इंतजार कर रहीं अस्थियों की पोटलियां

मध्य प्रदेश के इंदौर में विजय नगर मुक्तिधाम के दारोगा संजय घारू के अनुसार करीब 200 लोगों की अस्थियां यूं ही टंगी हैं। नियमानुसार दाह संस्कार के तीसरे दिन स्वजन फूल (अस्थियां) लेने मुक्तिधाम में आते हैं, लेकिन अब दूसरे दिन ही फावड़े से समेट कर राख हटा दी जाती है। कुछ लोग आते हैं और अपनों की अस्थियां मटकी या पोटली में बांध कर टांग जाते हैं। पूछने पर बताते हैं कि कोई गंगा, कोई गया या हरिद्वार में अस्थियों का विसर्जन करेगा, लेकिन कोरोना और लॉकडाउन के कारण फिलहाल नहीं जा सकते। अस्थियों से भरी पोटली मार्कर से नाम लिख कर घाट पर बनी रैक में जमा कर दी जाती है।

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