सुप्रीम कोर्ट ने कहा:नहीं रहेंगे मूकदर्शक, केंद्र वैक्सीन खरीद का पेश करे ब्योरा और राज्य मुफ्त टीकाकरण पर साफ करें स्थिति

नई दिल्ली ।

कोरोना के खिलाफ लड़ाई में सरकार की नीतियों में सीधे हस्तक्षेप से बचने के केंद्र सरकार के आग्रह पर कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह मूकदर्शक नहीं रहेगा। नीतियों की न्यायिक समीक्षा उसका कर्तव्य है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने वैक्सीन नीति से जुड़े कई सवाल केंद्र सरकार से पूछे और राज्यों से भी हलफनामा मांगा है कि वह मुफ्त में जनता को वैक्सीन दे रही हैं या नहीं।

ब्योरा पेश करने के लिए दिया दो सप्ताह का समय

केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि टीकाकरण सरकार का नीतिगत मामला है और यह कार्यपालिका के कार्यक्षेत्र में आता है, कोर्ट को टीकाकरण नीति में दखल नहीं देना चाहिए। कोर्ट ने आदेश में कहा है कि अधिकारों के बंटवारे से कोर्ट का नीतियों की समीक्षा करने का क्षेत्राधिकार खत्म नहीं होता।

जब कार्यपालिका की नीतियों से नागरिकों के संवैधानिक अधिकार बाधित हो रहे हों तो उस स्थिति में संविधान ने कोर्ट को मूकदर्शक नहीं बनाए रखा है। नीतियों की न्यायिक समीक्षा करना कोर्ट की ड्यूटी है। इस समय कोर्ट डायलाग ज्यूरीडिक्शन निभा रहा है जिसमें लोग महामारी प्रबंधन से संबंधित परेशानियां लेकर आ रहे हैं। कोर्ट देखेगा कि नीति संवैधानिक तौर पर खरी है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कोरोना टीकों (वैक्सीन) की खरीद का शुरुआत से लेकर अभी तक का पूरा ब्योरा पेश करने को कहा है। साथ ही जनसंख्या के हिसाब से ग्रामीण और शहरी लोगों के टीकाकरण का भी ब्योरा मांगा है। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को हलफनामा दाखिल कर मुफ्त टीकाकरण नीति पर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। केंद्र और राज्यों को दो सप्ताह में हलफनामा दाखिल करना है और टीकाकरण नीति भी पेश करनी है। इतना ही नहीं, केंद्र सरकार हलफनामे के साथ टीकाकरण नीति और सभी जरूरी दस्तावेज व फाइल नोटिंग भी संलग्न करेगी, जिसमें टीकाकरण नीति के पीछे की सोच झलकती हो।

टीकाकरण के लिए बजट में 35,000 करोड़ रुपये थे, सरकार बताए कैसे किया इस्तेमाल

सुप्रीम कोर्ट ने वैक्सीन की कीमत और अलग-अलग वर्ग के लिए अलग-अलग नीति पर केंद्र सरकार से सवाल पूछे हैं। यह भी पूछा है कि बजट में 35,000 करोड़ रुपये टीकाकरण के लिए थे, इस पैसे का कैसे इस्तेमाल हुआ और इसका उपयोग 18 से 44 वर्ष के लोगों के टीकाकरण पर क्यों नहीं हो सकता। ये निर्देश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने 31 मई को सुनवाई के बाद जारी आदेश में दिए हैं। कोर्ट का विस्तृत लिखित आदेश बुधवार को वेबसाइट पर अपलोड हुआ।

18 से 44 वर्ष के लोगों के टीकाकरण पर क्यों नहीं हो सकता इसका उपयोग

सुप्रीम कोर्ट ने आदेश में कहा कि सरकार तीनों वैक्सीन कोविशील्ड, कोवैक्सीन और स्पुतनिक खरीदे जाने का शुरुआत से लेकर और प्राप्ति तक का पूरा ब्योरा देगी। आर्डर पेश करने, मिलने की तारीख और वैक्सीन की मात्रा भी बताएगी। इसके अलावा पहले तीन चरणों के टीकाकरण का ब्योरा देगी। साथ ही ग्रामीण और शहरी जनसंख्या के टीकाकरण का हिसाब देगी। यह भी बताएगी कि तीनों चरणों के बचे हुए लोगों का टीकाकरण कब तक पूरा कर लिया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने बताया है कि राज्यों ने 18 से 44 साल की अपनी जनता को मुफ्त टीका लगाने की घोषणा की है। अगर ऐसा है तो राज्य हलफनामे के साथ टीकाकरण नीति दाखिल करें ताकि राज्य की जनता सुनिश्चित हो सके कि उसे राज्य के टीकाकरण केंद्र पर मुफ्त टीका मिलेगा।

ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता से लक्ष्य पूरा होना मुश्किल

कोर्ट ने 18 से 44 वर्ष के लोगों के टीके के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता पर सवाल उठाते हुए कहा कि आइटी मंत्रालय की 2019-20 की वार्षिक रिपोर्ट देखी जाए तो अभी भी लगभग 13,000 ग्राम पंचायतों में कामन सर्विस सेंटर (सीएससी) नहीं हैं। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में डिजिटलीकरण में बहुत अंतर है। वहां इंटरनेट की उपलब्धता और कनेक्टीविटी भी बड़ी समस्या है। ऐसे में इस आयुवर्ग के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता से लक्ष्य पूरा होना मुश्किल है।

कोर्ट ने कहा कि यह संभव नहीं है कि लोग कोविन पर आनलाइन पंजीकरण के लिए मित्रों और एनजीओ के भरोसे रहें। अशिक्षित लोगों के लिए पंजीकरण करना कठिन है। पंजीकरण स्लाट पाने के लिए लोगों के बार-बार सीएससी सेंटर पर जाने से वहां भीड़ हो सकती है। कोर्ट ने कहा कि कोविन और आरोग्य सेतु को क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध होना चाहिए। इसे दृष्टिबाधितों के अनुकूल भी बनाया जाए।

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